समलैंगिकता से जुड़े 5 मिथक, जिनके बारे में जानना ज़रूरी है #loveromance
September 30th, 2020 | Post by :- | 167 Views

इन दिनों समलैंगिक जोड़े अपनी सच्चाई को छुपाने के बजाय खुलकर सामने आ रहे हैं, लेकिन आम लोग अब भी ऐसे जोड़ों को स्वीकारने में झिझकते हैं, क्योंकि उनके मन में ऐसे रिश्तों के प्रति कई मिथक हैं. ऐसे ही कुछ मिथकों के बारे में विशेषज्ञों की राय जानी फ़ेमिना ने.

मिथक 1: समलैंगिक पुरुष व महिलाएं सामान्य नहीं होते
सच्चाई: क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट सीमा हिंगोरानी कहती हैं,‘‘ये वाक़ई एक मिथक है कि समलैंगिक पुरुष व महिलाएं सामान्य नहीं होते. भावनाओं और बुद्धिमत्ता की बात करें तो वे बिल्कुल आपके और हमारे जैसे ही होते हैं. फ़र्क़ सिर्फ़ यही है कि उनका सेक्शुअल ओरिएंटेशन (सेक्स के प्रति रुचि) अलग होता है. आपको यह जानकर शायद आश्चर्य हो कि समलैंगिक लोग हमसे कहीं ज़्यादा भावुक होते हैं, क्योंकि उन्हें हर समय इस बात की चिंता सताती रहती है कि उनके परिवार वाले और दूसरे लोग उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे.’’ वहीं मुंबई के केईएम अस्पताल के सेक्शुअल मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ राजन भोसले का कहना है,‘‘किसी को सामान्य या असामान्य मानने के लिए हर व्यक्ति विशेष की अपनी परिभाषा होती है. अधिकतर लोग यही मानते हैं कि सेक्स वंश को आगे बढ़ाने का ज़रिया है और समलैंगिकता के ज़रिए वंश को आगे बढ़ाना संभव नहीं है, इस लिहाज़ से देखा जाए तो समलैंगिकता को सामान्य नहीं ठहराया जा सकता. वहीं यह भी एक सच्चाई है कि कई ऐसे लोग हैं, जो अपने ही सेक्स वाले व्यक्तियों के प्रति आकर्षित होते हैं और उनके मुताबिक़ यह सामान्य है.’’ लाइफ़ कोच वरखा चुलानी, सीमा से सहमत हैं.‘‘यहां बात उनके सामान्य होने की नहीं, बल्कि उनके सेक्शुअल झुकाव की होती है. हालांकि हमारे समाज में इस बात को मान्यता नहीं मिली है, लेकिन यह सच है कि मनुष्य बाइसेक्शुअल है और यह प्रकृतिप्रदत्त झुकाव है कि आप दूसरे सेक्स के प्रति आकर्षण महसूस करते हैं या अपने ही सेक्स वाले व्यक्ति के प्रति.’’ मुंबई के हीरानंदानी अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ हरीश शेट्टी के मुताबिक़,‘‘समलैंगिकता पूरी तरह प्राकृतिक है, क्योंकि अपने ही सेक्स के प्रति आकर्षित होने वालों को विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण का अनुभव ही नहीं होता.’’ वरखा आगे कहती हैं,‘‘समलैंगिता भी दो तरह की होती है पहली प्रकृतिप्रदत्त यानी समलैंगिक व्यक्ति द्वारा चुनी हुई, जो सामान्य है और दूसरी किसी अनजाने डर की वजह से पनपने वाली, जैसे-मैं विपरीत सेक्स वाले पार्टनर को संतुष्ट कर पाऊंगी/पाऊंगा या नहीं आदि, ऐसी समलैंगिकता असामान्य या छद्म है.’’

मिथक 2:  समलैंगिकता वंशानुगत होती है
सच्चाई: ‘‘समलैंगिकता वंशानुगत नहीं होती. हां, इसके लिए अलग-अलग कारक और परिस्थितियां ज़रूर ज़िम्मेदार हो सकते हैं, जैसे- कभी-कभी कुछ लोग अपने माता-पिता में से किसी एक या भाई-बहन में से किसी एक पर भावनात्मक रूप से ज़्यादा निर्भर रहते हों और इस वजह से उनका रुझान पुरुष या महिला के प्रति बढ़ जाए और वे समलैंगिकता पसंद करने लगें. कभी-कभी जेंडर आइडेंटिटि डिस्ऑर्डर जैसी बीमारी की वजह से भी समलैंगिकता पनप सकती है,’’ यह कहना है सीमा का. वहीं डॉ शेट्टी कहते हैं,‘‘अब तक इसके सही कारणों का पता नहीं चल सका है. हां, इस संदर्भ में कई थ्योरीज़ हैं, जिनके आधार पर अनुमान लगाए जाते हैं. मैं इतना ज़रूर कहना चाहूंगा कि समान सेक्स के प्रति शारीरिक आकर्षण अप्राकृतिक नहीं है.’’
डॉ भोसले और वरखा भी इस नज़रिए से सहमत हैं. वरखा कहती हैं,‘‘यहां भी यही बात है कि मनुष्य प्राकृतिक रूप से बाइसेक्शुअल होता है और आपका बायलॉजिकल झुकाव इनमें से किसी एक सेक्स के प्रति कम या ज़्यादा हो सकता है. मेरे पास आने वाले समलैंगिक जोड़ों में से किसी के भी घर में कोई समलैंगिक नहीं था.’’ वहीं हमसफ़र ट्रस्ट के सीईओ विवेक राज आनंद भी यही कहते है,‘‘यह वंशानुगत भी नहीं है और आप किसी को ज़बरदस्ती समलैंगिक बना भी नहीं सकते. समलैंगिकता भी उतनी ही प्राकृतिक है, जितने कि स्त्री-पुरुष के बीच पनपने वाले प्राकृतिक रिश्ते.’’

मिथक 3: इनकी शादी करा देने पर सब ठीक हो जाएगा
सच्चाई: सभी विशेषज्ञ इस बात पर सहमत थे कि ये समलैंगिकों से जुड़ा सबसे बड़ा मिथक है कि यदि इनकी शादी करा दी जाए तो सब ठीक हो जाएगा. सीमा ने बताया,‘‘मेरे कई समलैंगिक पेशेंट्स के माता-पिता ने मेरे मना करने के बावजूद उनकी शादी करा दी और इसका नतीजा बहुत ख़राब हुआ. जिस व्यक्ति के साथ शादी कराई गई उसका जीवन भी बर्बाद हुआ और शादी कर दूसरे का जीवन ख़राब करने से उपजी ग्लानि की भावना से उनके बच्चे भी डिप्रेशन में आ गए. मैं यही कहूंगी कि यदि बच्चों ने आपको अपनी सेक्शुअल वरीयता के बारे में बताया है तो उन पर शादी का दबाव न डालें, इससे दो ज़िंदगियां ख़राब हो सकती हैं.’’ वरखा कहती हैं,‘‘अक्सर समलैंगिक बच्चों के माता-पिता उनकी शादी करने की ग़लती कर बैठते हैं और उनके बच्चे इसकी सज़ा भुगतते हैं. यह एक सच्चाई है कि यदि कोई समलैंगिक है तो वो विपरीत सेक्स वाले पार्टनर के साथ सेक्स संबंध कभी नहीं बनाएगा, क्योंकि उनके बीच आकर्षण पनप ही नहीं पाता.’’ डॉ भोसले भी इससे सहमति जताते हुए कहते हैं,‘‘यदि आपको पता है कि आपके बच्चे समलैंगिक हैं तो उनकी शादी न कराएं, इससे सिर्फ़ समस्याएं ही बढ़ेंगी.’’ डॉ शेट्टी कहते हैं,‘‘इस तरह की शादी के बाद सिवाय असंतोष के कुछ और हासिल नहीं होगा, क्योंकि समलैंगिक व्यक्ति कभी भी अपने विवाहित पार्टनर के साथ रिश्ते नहीं बना सकेगा.’’

मिथक 4: इन्हें सेक्शुअली ट्रांसमिटेड बीमारियां ज़्यादा होती हैं
सच्चाई: इस बारे में हमसफ़र ट्रस्ट के सीईओ विवेक राज आनंद कहते हैं,‘‘सेक्शुअली ट्रांसमिटेड बीमारियां (एसटीडीज़), एचआईवी/एड्स आदि का ख़तरा किन्नरों, सेक्स वर्कर्स, इंजेक्शन के ज़रिए ड्रग लेने वाले नशेड़ियों और समलैंगिकों में सबसे ज़्यादा होता है. समलैंगिकों में यह ख़तरा अधिक इसलिए होता है, क्योंकि हमारे यहां अभी हाल तक समलैंगिता ग़ैरक़ानूनी थी, अत: किसी एक समलैंगिक पार्टनर के साथ प्रतिबद्ध हो कर, घर बसा कर नहीं रहा जा सकता था. ऐसे में शारीरिक ज़रूरतों के चलते समलैंगिकों के एक से अधिक पार्टनर्स बन जाते थे और यही एसटीडीज़ की वजह है.’’ वहीं सीमा बताती हैं,‘‘यह एक मिथक है कि समलैंगिकों को एसटीडीज़ ज़्यादा होती है यह समस्या तो हेट्रोसेक्शुअल्स को भी उतनी ही होती है. सामान्यत: अंतरंग संबंधों के दौरान स्वच्छता और सुरक्षा का ख़्याल न रखा जाए तो ऐसी समस्याएं हो सकती हैं. अत: यह कहना ग़लत होगा कि समलैंगिकों को यह समस्या ज़्यादा होती है.’’ डॉ शेट्टी भी इस बात से इत्तफ़ाक रखते हैं, वहीं वरखा कहती हैं,‘‘समलैंगिकों को भी एसटीडीज़ होने का ख़तरा उतना ही है, जितना हेट्रोसेक्शुअल्स को. सेक्स संबंध बनाते समय यदि सुरक्षा से संबंधित एहतियात न बरतें जाएं, तभी यह समस्या होती है. यह एक मिथक है कि समलैंगिक जोड़ों में यह समस्या ज़्यादा होती है.’’

मिथक 5: ये वंश को आगे नहीं बढ़ा सकते
सच्चाई: ‘‘ये तो सच्चाई है कि दो पुरुषों या दो स्त्रियों के बीच के संबंधों से संतान पैदा नहीं की जा सकती, लेकिन वंश आगे बढ़ाने के कई दूसरे विकल्प भी मौजूद हैं, इन्हें अपनाकर संतानोत्पत्ति संभव है,’’ यह कहना है डॉ राजन भोसले का. सीमा कहती हैं,‘‘यदि आप विपरीत सेक्स वाले व्यक्ति की तरफ़ आकर्षण ही नहीं महसूस करते और परिवार भी बढ़ाना चाहते हैं तो साइंस की मदद लें. आईवीएफ़ तकनीक के ज़रिए या फिर बच्चे को गोद ले कर इस कमी को पूरा किया जा सकता है.’’ वहीं वरखा कहती हैं,‘‘यदि समलैंगिक जोड़े अपना बायोलॉजिकल बच्चा चाहते हैं तो स्पर्म या एग डोनेशन, सेरोगेट मां, आईवीएफ़ तकनीक के ज़रिए ऐसा किया जा सकता है. यदि वे बायोलॉजिकल बच्चे नहीं चाहते तो बच्चा गोद ले सकते हैं.’’ डॉ शेट्टी कहते हैं,‘‘सेक्स संबंधों का एकमात्र उद्देश्य वंश को आगे बढ़ाना ही तो नहीं है, ये साथी का प्यार पाने और भावनात्मक लगाव को व्यक्त करने का तरीक़ा भी तो हैं. वंश आगे बढ़ाने की ही बात है तो साइंस के पास कई विकल्प मौजूद हैं, उनका सहारा लिया जा सकता है.’’