टी-स्पॉट से जी-स्पॉट तक ….
November 17th, 2020 | Post by :- | 152 Views

जी-स्पॉट होता है या नहीं और इसका सेक्स लाइफ़ पर क्या असर पड़ता है, यह विवाद का विषय है, पर टी-स्पॉट का यक़ीनन सेक्स लाइफ़ पर नकारात्मक असर पड़ रहा है. अब आप कहेंगे टी-स्पॉट क्या है? तो टी-स्पॉट है हमारे जीवन में टेक्नोलॉजी की हद से ज़्यादा दख़ल. टेक्नोलॉजी के भौतिक असर का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत में सालाना 20 लाख टन ई-कचरा पैदा हो रहा है. रही बात मानसिक असर की तो हालिया सर्वेक्षणों से स्पष्ट हुआ है कि शहरी और क़स्बाई भारत का एक बड़ा हिस्सा रोज़ाना लगभग तीन घंटे का समय फ़ोन और इंटरनेट पर बिता रहा है. भारत में तक़रीबन 21 करोड़ लोग फ़ेसबुक का इस्तेमाल कर रहे हैं. लगभग 17% भारतीय फ़ोन पर अपना कामकाज निपटा रहे हैं और लगभग 26% लोग ऑफ़िस का काम घर पर ले आते हैं. ज़ाहिर है कि टेक्नोलॉजी के बिना काम नहीं चल सकता, लेकिन इसके नेगेटिव-इफ़ेक्ट से ज़रूर बचा जा सकता है. अपनी सेक्स लाइफ़ को रोमांचक बनाना चाहते हैं तो टी-स्पॉट से ब्रेक लेकर जी-स्पॉट की तलाश में लग जाएं. यक़ीनन आपकी सेक्स लाइफ़ अच्छी, बहुत अच्छी हो जाएगी.
दरअस्ल, टेक्नोलॉजी चीज़ों को आसान और असरदार बनाने के लिए होती है, लेकिन सेक्स के मामले में कुछ उल्टा ही देखने को मिल रहा है. 4-जी के इस दौर में मोबाइल पर भले ही फ्री-कॉलिंग की अवधि बढ़ रही हो, लेकिन दाम्पत्य जीवन में प्रेम-संवाद सिमट रहा है. हम हर पल फ़ेसबुक की वॉल पर नज़र बनाए हुए हैं, पर अपने पार्टनर से दिल की बात कहने का टाइम नहीं है. इंस्टाग्राम पर फ़ोटो-अपलोड की होड़ है, पर अपने पार्टनर को कुछ ग्राम प्यार दे पाने की बेताबी नदारद है. हम टेक्नोलॉजी के एक ऐसे टी-स्पॉट पर खड़े हैं, जहां रिश्तों के बीच कई तरह की अदृश्य दीवारें खड़ी हो रही हैं. इन दीवारों के पीछे इन्हैबिटिड सेक्शुअल डिज़ायर (आईएसडी), इरेक्टल डिस्फ़ंक्शन, फ्रीजिडिटी (काम-शीतलता) जैसी सेक्स-समस्याएं सिर उठा रही हैं. नतीजा यह हो रहा है कि बेडरूम में उपेक्षा भरी करवटें बदली जा रही हैं और बेड की सिलवटों में सिसकारियों की जगह ख़ामोश सिसकियां हिस्सेदारी निभा रही हैं.
साइकियाट्रिक डॉ हेमांगी ढवले कहती हैं,“स्मार्टफ़ोन और लैपटॉप जैसे उपकरणों से निकलनेवाली इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक फ्रीक्वेंसी (ईएमएफ़) कुछ हद तक महिलाओं और पुरुषों की फ़र्टिलिटी को प्रभावित कर सकती है. ईएमएफ़ का असर हमारे ब्रेन के न्यूरोट्रांसमीटर-सिरोटोनिन और एपिनेफ्रिन पर पड़ता है. इनके प्रभावित होने से डिप्रेशन घेर लेता है, जो प्रेम के स्वाद को फीका कर देता है. सेक्स की भावना शरीर से नहीं, दिमाग़ से जन्म लेती है. कोशिश होनी चाहिए कि टेक्नोलॉजी के प्रयोग से हम अपने दिमाग़ को इतना न थका डालें कि बेड पर बेहतर ढंग से परफ़ॉर्म न कर सकें.”

टूटता प्यार का कनेक्शन
पति-पत्नी और वो के बीच आज वो की भूमिका स्मार्टफ़ोन निभा रहा है. बैठे हैं डिनर टेबल पर और नज़रें टिकी हैं फ़ोन-स्क्रीन पर. खाने की तारीफ़ करने के बजाय यूट्यूब पर कोई नई रेसिपी तलाशी जा रही है. यही हाल बेडरूम का है. टीवी चल रहा है, लेकिन कोई देख नहीं रहा, पति-पत्नी मोबाइल पर मस्त हैं. दिल की बात दिलदार को बताने से पहले फ़ेसबुक फ्रेंड या ट्विटर फ़ॉलोअर्स के साथ शेयर की जा रही हैं. अलसाई सुबह स्नूज़ होते मोबाइल अलार्म से किसी तरह उठने का इंतज़ाम कर भी लिया, तो बेड से उठते ही अपने पार्टनर को प्यार भरा किस करने या मॉर्निंग सेक्स का अनूठा आनंद लेने के बजाय बैठ गए वाट्सऐप की खिड़की खोलकर. दिन की शुरुआत को मोबाइल के हवाले कर दिया गया. मोबाइल के टच से बेहतर पार्टनर का प्यार भरा टच निश्चित ही आपके दिन को तरोताज़ा कर जाएगा.

ख़तरे में फ़र्टिलिटी
डॉ ऋषिकेश पई, इंफ़र्टिलिटी एक्स्पर्ट, लीलावती हॉस्पिटल, कहते हैं,“तकनीकी रूप से उन्नत होने के साथ ही हम अधिकाधिक सेडेंटरी (निष्क्रिय) बनते जा रहे हैं. एक्सरसाइज़ और ऐक्टिविटी स्पर्म काउंट को बढ़ाता है. लंबे समय तक बैठे रहना फ़र्टिलिटी के लिए स्वाभाविक रूप से बुरा है. आलम यह है कि लोग ऑफ़िस का काम और तनाव घर ला रहे हैं. इस तनाव से शक्तिशाली ऐंटी-इरेक्शन हार्मोन एड्रेनलिन अपना रंग दिखाता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से इरेक्टल डिस्फ़ंक्शन्स का कारण बनता है.” बेड पर स्मार्टफ़ोन और टैबलेट का उपयोग भी हाई एड्रेनलिन की स्थिति में ले जाता है. समझदारी इसी में है कि बेड का इस्तेमाल सिर्फ़ नींद और सेक्स के लिए ही करें.

लैप पर न हो लैपटॉप
मशहूर डर्मैटोलॉजिस्ट डॉ आर खारकर कहते हैं,“शोधों से साफ़ हुआ है कि लगातार गर्मी के संपर्क में रहने पर स्पर्म काउंट और उनकी क्वॉलिटी प्रभावित होती है.” हालिया अध्ययन में यह बात सामने आई है कि एक घंटे तक गोद में रखकर लैपटॉप का उपयोग करने पर स्क्रोटम एरिया में स्क्रोटल तापमान लगभग 5 डिग्री तक बढ़ जाता है. कुछ लोग लैपटॉप के नीचे पैड या तकिया लगाकर ख़ुद को सुरक्षित मानते हैं, लेकिन लैपटॉप न हो तो भी जांघ सटाकर बैठने पर इस एरिया का तापमान बढ़ता ही है. धीरे-धीरे ऑक्सिडेटिव तनाव के साथ-साथ स्पर्म मोटिलिटी (गतिशीलता) और वाइअबिलिटी (व्यावहार्यता) में गिरावट देखी जा सकती है. हालांकि इस मामले में अभी काफ़ी शोध किया जाना बाक़ी है.

इंटरनेट की दोधारी तलवार
इंटरनेट पर सुलभ पॉर्न दोधारी तलवार की तरह है. जहां ड्रग की तरह लत बनकर यह जीवन को तबाह कर सकता है, वहीं कभी-कभार पार्टनर एक साथ पॉर्न देखें, तो यह सेक्स लाइफ़ में नया रोमांच पैदा कर सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि रियल-लाइफ़ में सेक्स का आनंद जितना कम होगा, पॉर्न की तरफ़ रुझान उतना ज़्यादा होगा. पॉर्न का आदी व्यक्ति वास्तविक सेक्स के प्रति अरुचि रखने लगता है. कुछ लोग पॉर्न फ़िल्मों की तकनीक रियल-लाइफ़ में आज़माने की कोशिश करते हैं. वाइब्रेटर या अन्य सेक्स टॉय के ग़लत इस्तेमाल से नुक़सान कर बैठते हैं.

माहौल हो ख़ुशनुमा
प्रसिद्ध अमेरिकी सेक्स रिसर्चर मास्टर्स ऐंड जॉनसन अक्सर अपने मरीजों का इलाज करते समय उन्हें दो सप्ताह की छुट्टी पर ले जाते थे. इस दौरान उन्हें परिवार से दूर रखा जाता था. पार्टनर को सारा समय एक-दूसरे के साथ बिताना पड़ता था. मास्टर्स और जॉनसन का कहना था कि हम किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि रिश्तों का इलाज करते हैं. हमें भी इस बात को अपने जीवन में उतारना चाहिए. अपने घर, अपने पार्टनर के लिए कुछ मी टाइम रखें. इस दौरान, टीवी, फ़ोन, लैपटॉप से दूर रहें. सप्ताह में कम से कम एक बार पार्टनर के साथ घूमने जाएं. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के शोर को बेडरूम से दूर कर माहौल ख़ुशनुमा और अपीलिंग बनाए रखें.