जब घर बन जाए राजनीति का मैदान …
August 23rd, 2020 | Post by :- | 225 Views

यदि आपके, आपके पति और परिजनों के राजनीतिक विचार न मिलते हों तो घर को राजनीति का मैदान न बना लें, बल्कि इससे उबरने के लिए एक्सपर्ट्स की राय पर अमल करें.

‘हम इस बारे में लड़ते हैं, लेकिन फिर रास्ता निकाल लेते हैं.’
कल्याणी कांडपाल, 27, हॉटीकल्चरिस्ट
‘‘देश में आज की राजनैतिक स्थिति को देखते हुए ना तो मैं और ना ही मेरे मंगेतर किसी राजनैतिक दल को पूरी तरह समर्थन देते हैं. लेकिन राजनीति पर हम दोनों के विचार बिल्कुल नहीं मिलते, वे एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं. मेरे मंगेतर इस मामले में बहुत दृढ़ विचारोंवाले हैं और उन्हें रूढ़िवादी दल पसंद नहीं हैं. मैं अन्य भारतीयों की तरह ही थोड़ी रूढ़िवादी हूं और ऐसे दलों के प्रति उनकी नकारात्मक सोच को समझ ही नहीं पाती हूं. सोच में यह अंतर हमारे बीच थोड़े मतभेद पैदा कर देता है, पर अपनी-अपनी बात को एक-दूसरे के सामने रख लेने के बाद हम फिर से सामान्य हो जाते हैं. यदि हमारे राजनैतिक दल कम भ्रष्टाचारी होते तो शायद हमारे राजनैतिक विचार एक-दूसरे से बिल्कुल ही बेमेल होते.’’

‘आपको असहमत होने के लिए सहमत होना पड़ेगा.’
डॉ. केरसी चावड़ा, साइकियाट्रिस्ट
‘‘यदि आप पहले से ही जानती हैं कि आपके साथी का राजनैतिक झुकाव किस ओर है तो आपके रिश्ते में स्थिरता बनी रहेगी, लेकिन यदि वो अचानक आपके सामने अपनी विचारधारा का खुलासा करते हैं तो समस्या हो सकती है. मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूं, जिनका किसी राजनैतिक दल से संबंध नहीं था, पर उनकी पत्नी एक राजनैतिक दल के लिए काम करती थीं. सारी चीज़ें ठीक चल रही थीं. लेकिन जब उनकी पत्नी ने एक नए राजनैतिक दल के लिए काम करना शुरू किया तो समस्या आ गई, क्योंकि उनके पति उस पार्टी की कट्टर नीतियों के ख़िलाफ़ थे. फिर उन दोनों ने जल्द ही इस मुद्दे का हल निकाल लिया. ऐसे जोड़ों को कुछ मुद्दों पर असहमत रहने के लिए सहमति बना लेनी चाहिए और उन मुद्दों को वैसा ही छोड़ देना चाहिए.’’

‘राजनैतिक या धार्मिक बातें सार्वजनिक जगहों पर कभी न करें’
डॉ कमल खुराना, साइकोलॉजिस्ट
‘‘किसी को स्वीकार करने का मतलब है, उसकी विचारधाराओं को स्वीकार करना. लेकिन कुछ ही जोड़े इस बात को समझ पाते हैं. अपने राजनैतिक विचारों पर चर्चा करते समय वे बहस में फंस जाते हैं. और वे ये महसूस ही नहीं कर पाते कि वे इस राजनैतिक चर्चा को व्यक्तिगत विचारधारा मान बैठते हैं. फिर स्थितियां बिगड़ने लगती हैं. इस विषय पर दृढ़ विचार रखना बुरा नहीं है, लेकिन अपने ही विचार की पुरज़ोर पैरवी करने से झगड़े की शुरुआत हो सकती है. हमारे देश में तो राजनीति धर्म के एक्स्टेंशन की तरह है. अत: इस पर हुई तीखी बहस भयावह हो सकती है.’’