ऑफ़िस स्पाउस: सुलझन या उलझन? #loveromance
May 4th, 2022 | Post by :- | 38 Views

वह ऑफ़िस में आपका सबसे क़रीबी सहकर्मी है. ऑफ़िस की आपकी हर समस्या को चुटकियों में सुलझाता है. वह आपके जन्मदिन, शादी की सालगिरह,पसंदीदा डिश, पसंदीदा रंग या फ़ेवरेट फ़िल्म स्टार्स के बारे में ही नहीं जानता, बल्कि सबसे बड़ी कमज़ोरी, डर और तो और आपके टॉप सीक्रेट्स के बारे में भी जानता है. ऐसे क़रीबी और भरोसेमंद व्यक्ति को ऑफ़िस स्पाउस कहा जाता है. ऑफ़िस स्पाउस यानी ऑफ़िस का जीवनसाथी. ऑफ़िस स्पाउस, ऑफ़िस में जहां आपकी समस्याएं सुलझाता है वहीं आपकी उलझन का कारण भी बन सकता है. आइए इस रिश्ते कुछ सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को जानने के साथ इस रिश्ते में संतुलन साधने के गुर जानते हैं.

ऑफ़िस स्पाउस का सकारात्मक पहलू

ऑफ़िस स्पाउस आधुनिक वर्क कल्चर की देन है. आज जिस तरह काम के घंटे बढ़े हैं उसकी वजह से कामकाजी व्यक्ति अपने जीवनसाथी या परिवार के अन्य सदस्यों की तुलना में ज़्यादातर समय ऑफ़िस के सहकर्मियों के साथ बिताते हैं. उनसे बात करते हैं, उनके साथ अपनी ख़ुशियां बांटते हैं और सुख-दुख शेयर करते हैं. वे साथ लंच करते हैं, अपने सपनों, उम्मीदों के बारे में उन्हें बताते हैं. हंसी-मज़ाक के हल्के-फुल्के क्षणों के साथ ही वर्क प्रेशर भी झेलते हैं. सीधे शब्दों में कहें तो ऑफ़िस के सहकर्मियों के संग प्रोफ़ेशनल संबंध होने के साथ-साथ आत्मीयता का रिश्ता भी पैदा हो ही जाता है. ऐसे में ऑफ़िस के उन सहकर्मियों में किसी ख़ास से गहरी दोस्ती हो जाना स्वाभाविक है. इस ख़ास दोस्ती के कई सकारात्मक पहलू हैं.

 * जानता है प्रोफ़ेशनल समस्याओं का बेहतर तोड़                                                                                                                     
आईटी सेक्टर में काम करने वाली दिल्ली की माधवी व्यास* कहती है,‘‘चूंकि ऑफ़िस स्पाउस आपके साथ ही काम करता है, अत: बात बॉस को हैंडल करने की हो या वर्क प्रेशर से छुटकारा पाने की, वह इनका तोड़ जानता है. जबकि दूसरी ओेर यदि जीवनसाथी का कार्यक्षेत्र अलग होता है तो वह कई बार आपकी प्रोफ़ेशनल समस्याओं को उतनी अच्छी तरह नहीं समझ पाता. ऐसे में कई बातें जीवनसाथी के साथ शेयर करने के बजाय ऑफ़िस स्पाउस से करना आसान हो जाता है.’’

* निजी ज़िंदगी भी हो जाती है आसान
अपने ऑफ़िस स्पाउस के बारे में बताते हुए भोपाल की राधिका त्रिपाठी* कहती हैं,‘‘मेरे और मेरे ऑफ़िस स्पाउस राजीव के बीच का रिश्ता ऑफ़िस में तो है ही, इस रिश्ते के चलते हमारा परिवार भी एक-दूसरे के क़रीब आ गया है. हम एक-दूसरे के जीवनसाथी को बहुत अच्छे से जानते हैं और एक-दूसरे के पारिवारिक मामलों में सहायता भी करते हैं. मेरे पति तो राजीव की समस्या सुलझाने की क़ाबिलियत की दाद देते हैं. मेरा मानना है कि ऑफ़िस स्पाउस की वजह से सिर्फ़ ऑफ़िस की ही नहीं, बल्कि निजी ज़िंदगी भी काफ़ी हद तक आसान हो जाती है.’’

* सहारा मिलता है ऑफ़िस के तनावपूर्ण माहौल में
ऑफ़िस स्पाउस को सुलझन मानने वाली प्रीति जैन कहती हैं,‘‘इससे अच्छा और क्या होगा कि ऑफ़िस में कोई आपका ध्यान रखने वाला हो. हर ज़रूरत के समय आपके साथ हो. ऑफ़िस स्पाउस ऑफ़िस के तनावपूर्ण माहौल में एक बड़ा सहारा होता है, क्योंकि ऑफ़िस के अच्छे और बुरे वक़्त में वह आपके साथ होता है. बात डेड लाइन पर काम पूरा करने की हो या ऑफ़िस पॉलिटिक्स का सामना करने की, वह मज़बूत आधार की तरह साथ देता है. इससे कई समस्याएं चुटकियों में हल हो जाती हैं. इस तरह देखें तो ऑफ़िस स्पाउस सुलझन का दूसरा नाम है. मैं तो इतना ही कहूंगी जब तक यह रिश्ता अपनी सीमा पहचानता है, इसके उलझन बनने की संभावना न के बराबर होती है.’’

ऑफ़िस स्पाउस का नकारात्मक पहलू

जब ऑफ़िस स्पाउस ऑफ़िस की चहारदीवारी लांघकर आपकी निजी ज़िंदगी को प्रभावित करने लगता है, तब यह रिश्ता उलझन पैदा करने लगता है. ख़ासकर तब, जब हम अपने जीवनसाथी की तुलना ऑफ़िस स्पाउस से करने लगते हैं. यह जानते हुए भी कि दो इंसान एक जैसे नहीं हो सकते, उसकी ख़ूबियों की अपेक्षा अपने जीवनसाथी में भी करने लगते हैं. इसके अलावा कभी-कभी ऑफ़िस स्पाउस द्वारा आपके पारिवारिक मामलों में बेवजह के हस्तक्षेप करने से भी यह रिश्ता तकलीफ़देह बन जाता है.

* लगातार तुलना करने से चिढ़ पैदा होती है
अपने पति की ऑफ़िस स्पाउस से परेशान मुंबई की रोहिणी श्रीवास्तव कहती हैं,‘‘मेरे पति एक मल्टीनैशनल कंपनी में काम करते हैं. काम के लंबे घंटों के चलते उनका ज़्यादातर समय ऑफ़िस में ही बीतता है. घर में भी वे ऑफ़िस के सहकर्मियों के बारे में बात करते रहते हैं. शुरू-शुरू में मैं उनकी बातों को बहुत ध्यान से सुना करती थी. मुझे लगता था कि वे कितने अच्छे हैं, जो ऑफ़िस की हर बात मुझसे शेयर करते हैं. पर धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि वे अपनी एक सहकर्मी नीतू से हर समय मेरी तुलना करते रहते हैं. हद तो तब हो जाती है जब कहते हैं, नीतू तुम्हारे जगह होती तो ऐसे करती, वो ऐसी स्थिति पैदा ही न होने देती, उसमें ग़ज़ब की व्यावहारिक समझ है इत्यादि. उनकी ऐसी बातों से मैं बुरी तरह चिढ़ जाती हूं. मुझे उसके नाम से ही नफ़रत हो गई है. कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे मैं नहीं, बल्कि नीतू उनकी पत्नी है. इस बारे में उनसे कहती हूं तो कहते हैं, तुम बिना मतलब की चिंता करती हो. वह मेरी सबसे अच्छी सहकर्मी है. उनके कई बार समझाने के बावजूद हम दोनों के बीच इस बारे में अक्सर नोंक-झोंक होती ही रहती है.’’

* पसंद नहीं आती बेवजह की दख़लअंदाज़ी
अपने ऑफ़िस स्पाउस के बारे में बताते हुए पेशे से अकाउंटेंट वर्षा सिंह कहती हैं,‘‘मैं और राकेश पिछले सात वर्षों से एक ऑफ़िस में काम करते हैं. हम दोनों को ऑफ़िस में एक-दूसरे का साथ अच्छा लगता है. कोई भी समस्या हो हम दोनों मिलकर सुलझाते हैं. हां, यह सही है कि वह ऑफ़िस में मेरा ध्यान रखता है, पर मुझे कभी-कभी अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी में उसकी दख़लअंदाज़ी बिल्कुल पसंद नहीं आती. एक बार मेरे और मेरे पति के बीच थोड़ी-सी कहासुनी हो गई थी, जब मैंने उससे इस बारे में बताया तो उसने मेरे मना करने के बावजूद मेरे पति को फ़ोन लगाया और सफल दाम्पत्य जीवन के बारे में लेक्चर झाड़ने लगा. मुझे यह बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा. घर पहुंचने पर मेरे पति ने भी अपने घर की बात ऑफ़िस में बताने को लेकर काफ़ी फटकार लगाई. मेरे दाम्पत्य जीवन में इस बात को लेकर बेवजह परेशानी पैदा हो गई. उस दिन के बाद राकेश और मेरे बीच पहले जैसी आत्मीयता नहीं रही. अब मैं उससे अपने घर की कोई बात शेयर नहीं करती हूं.’’

* अच्छा नहीं लगता अधिकार जताना’’
नागपुर की कल्पना कहती हैं,‘‘प्रवीण से मेरी ऑफ़िस में काफ़ी जमती है, पर मैंने एक बात पर ग़ौर किया है कि ऑफ़िस में कोई दूसरा सहकर्मी मुझसे बात करे या मेरी सहायता करे तो वह बहुत चिढ़ जाता है. वह चाहता है कि ऑफ़िस में मेरी सिर्फ़ उससे ही दोस्ती रहे. पर यह बात मुझे रास नहीं आती. मुझे उसका इस तरह अधिकार जताना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता.’’

क्या करें कि ख़ुशहाल रहे यह रिश्ता

चूंकि आपकी ज़िंदगी में दोनों की अपनी अलग अहमियत है अत: निजी ज़िंदगी और ऑफ़िस की ज़िंदगी में संतुलन बनाए रखना आपकी प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि यह रिश्ता लंबे समय तक बना रहे. कैसे होगा यह बता रहे हैं हमारे एक्प्मर्ट.

* स्पष्टवादी रुख़ ज़रूरी है
मुंबई की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट सीमा हिंगोरानी कहती हैं,‘‘8 से 10 घंटों तक एक ही जगह रुक कर काम करने से दो इंसानों में अपनेपन की भावना आ ही जाती है. प्रत्यक्ष रूप से न सही अप्रत्यक्ष रूप से वे एक-दूसरे की निजी ज़िंदगी को प्रभावित करते हैं. इससे कई बार ग़लतफ़हमी और उलझन की स्थिति पैदा हो सकती है. इसके लिए स्पष्टवादी रुख़ बेहद ज़रूरी है. सबसे पहले अपने जीवनसाथी का उससे परिचय कराएं. उसके जीवनसाथी से भी मिलें. जीवनसाथी को उसके बारे में जानकारी होने से भविष्य में ग़लतफ़हमी की स्थिति से बचा जा सकता है. घर में ऑफ़िस स्पाउस के बारे में बात करें, पर यह ध्यान रखें कि कहीं यह ज़रूरत से ज़्यादा तो नहीं हो रहा है. एक और महत्वपूर्ण बात जिसका ध्यान रखना ज़रूरी है वह यह कि अपने जीवनसाथी की उसके साथ कभी भी तुलना न करें. इससे आपके निजी रिश्ते में खटास पैदा हो सकती है. ऑफ़िस स्पाउस की तारीफ़ भी एक हद तक ही करें. जीवनसाथी से बार-बार ऑफ़िस स्पाउस की तारीफ़ करने से ईर्ष्या की भावना बढ़ सकती है. उसे ऐसा लगेगा कि आपकी ज़िंदगी में उससे ज़्यादा अहमियत किसी और की है.’’

* निजी ज़िंदगी के राज़ न शेयर करें
‘‘यह रिश्ता उलझने न पाए इसके लिए बहुत सावधानी बरतने की ज़रूरत होती है, क्योंकि यह रिश्ता बहुत ही बारीक़ धागे से जुड़ा होता है,’’ कहना है जबलपुर के मनोचिकित्सक डॉ अजय कुमार का. डॉ कुमार आगे कहते हैं,‘‘यदि आप चाहते हैं कि यह रिश्ता लंबे समय तक चलता रहे तो आपको कई दायरे निर्धारित करने होंगे. मसलन, ऑफ़िस स्पाउस से अपनी व्यक्तिगत जानकारियां एक सीमा तक ही शेयर करें. ख़ासकर अपनी वैवाहिक ज़िंदगी के बारे में. यदि वो अपनी निजी ज़िंदगी का कोई राज़ आपको बताना चाहे तो विनम्रता से मना कर दें. हालांकि ऐसा करना बहुत कठिन है, पर इस रिश्ते की बेहतरी के लिए थोड़ा सख़्त तो होना ही पड़ेगा. यदि इसके बावजूद वह अपनी निजी ज़िंदगी से जुड़ी बातें आपको बताए तो उन बातों को अपने जीवनसाथी से भी शेयर करें, ताकि यह रिश्ता एक्सक्लूसिव न रहे. इसके साथ ही अपने ऑफ़िस स्पाउस से गाहे-बगाहे यह ज़रूर जाहिर करते रहें कि आप अपने जीवनसाथी से कितना प्यार करते हैं, उसकी आपकी ज़िंदगी में कितनी अहमियत है. ऐसा करने से उसका आपकी ओर भावनात्मक झुकाव एक सीमा तक ही रहेगा.’’

* ऑफ़िस में भी उसकी दख़लअंदाज़ी की सीमा तय करें
मुंबई के मनोचिकित्सक डॉ हरीश शेट्टी कहते हैं,‘‘ऑफ़िस स्पाउस न सिर्फ़ आपकी निजी ज़िंदगी को प्रभावित करता है बल्कि ऑफ़िस की ज़िंदगी को भी प्रभावित करता है. यदि आपका ऑफ़िस स्पाउस है तो दूसरे सहकर्मी पास आने से कतराते हैं. इससे ऑफ़िस में आप दोनों अकेले पड़ सकते हैं. ऑफ़िस का माहौल भी तनावग्रस्त हो सकता है. अत: इस रिश्ते को ख़ुशहाल रखने के लिए निजी ज़िंदगी ही नहीं ऑफ़िस की ज़िंदगी में भी ऑफ़िस स्पाउस की दखलअंदाज़ी की एक सीमा तय करना ज़रूरी है.’’

नोट: कुछ नाम आग्रह पर बदले गए हैं